Friday, September 09, 2016

पराए युद्ध के घाव

कम ही लड़ाई हैं जो हम चुनते हैं
बहुधा हमें मिलती हैं
पराई लड़ाइयॉं
जो हम पर थोपी गई थीं
जिरहबख्‍तरों पर अगाध विश्‍वास वाले योद्धाओं ने।
लड़ाइयॉं जिन्‍हें हम जीतना नहीं चाहते
न ही हार से बचने के ही लिए लड़ रहे हैं हम
अपनी कहूँ
खड़ा हूँ इस बॉलकोनी पर अपने ही घर की
जिसे न जाने क्‍यों
कुछ संप्रभु मन घोषित कर चुके हैं
युद्ध का मैदान।
खड़ा हूँ दम साधे बस
सहमे भयभीत (पराजय से नहीं)
वरन
ये जानने कि
अगाध विश्‍वास वाली योद्धा
जब जिरहबख्‍तर उतारेगी
(जीत कर या पराजित, मुझे फर्क नहीं पड़ता)
तो खुद घायल होगी कि नहीं।

Tuesday, August 23, 2016

मेरी वह दोस्त इतने भरोसे की जिससे बात करने में भरोसे पर विचार नहीं करना पड़ता। उस रोज़ किसी वजह से अकेले थे हम उसके घर, यह कोई अलग घटना नहीं थी जिसे महसूस किया जाता। फिर वक़्त हुआ, मैंने कहा अच्छा चलता हूँ दरवाजे के और मुड़ा हाथ अनदेखे ही दरवाजे के लैच की दिशा में बढ़ा.. तब मुझे दिखा,  बस यही क्षण बस यही। मैं सहज ही मुड़ा था लेकिन देखा कि वह चौंकती है और फिर एक,  नहीं आधा ही कदम पीछे होती है। उसके दोनों हाथ इवेसिव भंगिमा में छातियों की और गए थे...ओह। मैं बेहद आहत और हैरत निगाह से देकगता हूँ , सेकण्ड का चौथाई भर ही रहा होगा वो एक अपोलेजेटिक मुस्कान देती है...मैं सोचकर मुस्करा देता हूँ कि कहीं उसे बुरा न लगे। फिर मुझे लगता है कि आखिर यही सब तो उसका कुल हासिल है, पहला रिफ्लेक्स एक्शन खुद को बचाने का... किसी मर्द पर भरोसा न् कर पाना...पर मैं नीचे आ गाड़ी में रो देता हूँ। खुद के अपमान पर शायद नहीं, उसकी जिंदगी पर।  ज़िन्दगी का उसका हासिल 'इनेबिलिटी तो ट्रस्ट'... ज़िन्दगी हमेशा कवच निकालकर ही जीना.. ओह मेरी प्यारी।
उस क्षण मुझे पता था पता होना था कि उस क्षण का वह अ-भरोसा व्याप्त हो पूरी ज़िन्दगी पर छाएगा।  अपने ही इस कवच की कैद... बाद की बस सारी कहानी इस अ-भरोसे के बीज के उगने, वृक्ष हो जाने की कहानी है।

Friday, August 19, 2016

भरोसा कर सकने की क़ाबलियत के मायने

मेरी वह दोस्त इतने भरोसे की जिससे बात करने में भरोसे पर विचार नहीं करना पड़ता। उस रोज़ किसी वजह से अकेले थे हम उसके घर, यह कोई अलग घटना नहीं थी जिसे महसूस किया जाता। फिर वक़्त हुआ, मैंने कहा अच्छा चलता हूँ दरवाजे के और मुड़ा हाथ अनदेखे ही दरवाजे के लायक की दिशा में बढ़ा.. तब मुझे दिखा,  बस यही क्षण बस यही। मैं सहज ही मुड़ा था लेकिन देखा कि वह चौंकती है और फिर एक,  नहीं आधा ही कदम पीछे होती है। उसके दोनों हाथ इवेसिव भंगिमा में छातियों की और गए थे...ओह। मैं बेहद आहत और हैरत निगाह से देकगता हूँ , सेकण्ड का चौथाई भर ही रहा होगा वो एक अपोलेजेटिक मुस्कान देती है...मैं सोचकर मुस्करा देता हूँ कि कहीं उसे बुरा न लगे। फिर मुझे लगता है कि आखिर यही सब तो उसका कुल हासिल है, पहला रिफ्लेक्स एक्शन खुद को बचाने का... किसी मर्द पर भरोसा न् कर पाना...पर मैं नीचे आ गाड़ी में रो देता हूँ। खुद के अपमान पर शायद नहीं, उसकी जिंदगी पर।  ज़िन्दगी का उसका हासिल 'इनेबिलिटी तो ट्रस्ट'... ज़िन्दगी हमेशा कवच निकालकर ही जीना.. ओह मेरी प्यारी।
उस क्षण मुझे पता था पता होना था कि उस क्षण का वह अ-भरोसा व्याप्त हो पूरी ज़िन्दगी पर छाएगा।  अपने ही इस कवच की कैद... बाद की बस सारी कहानी इस अ-भरोसे के बीज के उगने, वृक्ष हो जाने की कहानी है।

Sunday, May 01, 2016

दुनिया होने का सच

एक होते हैं शब्द
और होती है शब्दों की दुनिया
जैसे एक होता है प्यार
और होती है प्यार की दुनिया
पर सुनो प्यार होता प्यार..
लेकिन प्यार की दुनिया होती है
झूठ, धोखा और लिसड़ा हुआ स्वार्थ
एक होती है कविता
और होती है कविता की दुनिया
टकराती प्रवंचनाएं, फूहड़ अहम् और छद्म शिखर
सुनो दुनिया
तुम हर सच के साथ ऐसा क्यों करती हो
उसे सच रहने क्यों नहीं देती
क्योंकि एक होता है सच
और होती है सच की दुनिया
जो
और चाहे दुनियाभर का कुछ भी हो
सच नहीं होती।

Monday, April 18, 2016

रैण दो, आपसे न हो पाएगा प्रोफेसर साहब

प्रो. गोपेश्‍वर सिंह हमारे ही विश्‍वविद्यालय में हिन्‍दी के प्रोफेसर हैं। पहले विभागाध्‍यक्ष रह चुके हैं। कल के जनसत्‍ता में उन्‍होंने आलोचना की अधोगति के स्‍यापे में ठीकरा सोशल मीडिया के सर फोड़ा है। विनीत, रवीश और प्रभात जैसे सक्रिय ब्‍लॉगरों को उदाहरण की तरह प्रस्‍तुत करते हुए यह साबित करने की जिद दिखाई है कि सोशल मीडिया के कथित तुरंता होन के चलते गंभीर आलोचना की संभावना खत्‍म हो गई है। मेरी प्रतिक्रिया: 

यात्रा में था तो कल जनसत्‍ता उपलब्‍ध नहीं था आज पढ़ा है। सोशल मीडिया को लेकर की गई ये कोई पहली गैर जिम्‍मेदार टिप्‍पणी नहीं है। पिछले दस साल में हम जो ब्‍लॉग-इंटरनेट वाले हैं उन्‍होंने उपहास, उपेक्षा,असुरक्षा, ईर्ष्‍या सब चरणों को भुगता है, सो ये टिप्‍प्‍णी तो फिर भी खिसियाहट ज्‍यादा है। तब भी मैंने सोचा था कि पूर्वग्रह छोड़कर प्रो. सिंह के नजरिए को पूरी सदाशयता से समझने कर कोशिश की जाए। किंतु दिक्‍कत ये है कि आलेख में सोशल मीडिया की समझ की एबीसीडी भी नदारद है।
प्रो. सिंह अपनी आधारभूत पूर्वधारणाओं के आधार तक स्‍पष्‍ट कर पा रहे हैं...आलोचना में वर्णित पतन की जिम्‍मेदारी सोशल मीडिया पर कैसे है ? यूनीकोड 2003-04 में दिखता है और ब्‍लॉगेतर हिन्‍दी सोशल मीडिया की उम्र उससे भी कम है यानि सोशल मीडिया की 'छाया' आलोचना पर मात्र 5-7 साल की है तो क्‍या उससे पहले हमें आलोचना का स्‍वर्ण काल चल रहा था ?
एक अहम पूर्वधारण ये भी है हिन्‍दी पब्लिक स्‍फेयर मोनोलिथिक है यानि सोशल मीडिया और शेष आलोचना वृत्‍त में लोग एक ही हैं... अजब जिद है, सारे उदाहरण बताते हैं कि दरअसल सोशल मीडिया के हिन्‍दी वाले (खासकर पाठक) अधिकांशत वे हैं जो अन्‍यथा हिन्‍दी जगत से दूर होते..सोशल मीडिया ने हिन्‍दी के पब्लिक स्‍फेयर को विस्‍तार दिया है। ब्‍लॉगर याद करेंगे कि इस बात को वहॉं बार बार रेखांकित किया जाता था ये हिन्‍दी के यूनीलेखक व यूनीपाठक, छपाई वाले लेखको/पाठकों से अलग हैं तथा बहुत ही थोड़ा हिस्‍सा कॉमन है।
एक आलोचकीय प्रश्‍न यह भी है कि सरजी ये जो कथन है कि 'सोशल मीडिया अभिव्‍यक्ति की भूख मार देती है' इसके लिए कोई संदर्भ, कोई शोध उद्धृत करने की कोई जरूरत क्‍यों नहीं लगी आपको... या जो ठाकुर साहब कहें उसे बस मान लेना पड़ेगा...क्‍योंकि बाकी सब सबूत तो बताते हैं कि इससे हिन्‍दी टेक्‍सट के उपभोग और उत्‍पादन दोनों का विस्‍तार हुआ है।
अब खरी खरी कुछ सुन लीजिए, सरजी कुछ पढ़ा कीजिए, हिन्‍दी में न मिले तो अंग्रेजी का पढ़ लीजिए। हाईपर टेक्‍स्‍ट वहीं नहीं है जो टेक्‍स्‍ट है उसे न पढ़ा वैसे जाता है जैसे छापे के टेक्‍स्‍ट को न लिखा ही वैसे जाता है। यूँ आपको चंद संदर्भ यहॉं दे सकता हूँ किंतु सही तो होगा कि जिन्‍हें तिलंगे कहकर अपमानित कर रहे हैं, खासकर विनीत (Vineet Kumar)को उसे एक बार फोन लगाएं (कोई शर्म की बात नहीं है, ज्ञान जिसके पास हो ले लेना चाहिए) वे आपको चार किताब गिना सकता है उसे पढ़कर आपकी कुछ नजर खुलेगी।
मजे की बात यह है‍ कि आपकी उम्‍मीद तो यह है कि इस सर फुटौवल में आप टेक्‍स्‍ट को हाईपरटेक्‍स्‍ट के सामने ला खड़ा कर पाएंगे और इस धुंधलके में आपको टेक्‍स्‍ट खेमे की सरदारी मिल जाएगी पर है ये गलतफहमी ही। तिस पर मजेदार बात यह है कि जिस पोलिमिकल अंदाज में आपने यह लेख लिखा है वह खुद ही दरअसल सोशल मीडिया तेवर...यानि दरअसल जनसत्‍ता में एक ब्‍लॉग पोस्‍ट पर लिख दी है बस लिंक नहीं दे पाए हैं :)
अब आखिरी बात इसी विश्‍वविद्यालय का ही शिक्षक होने के नाते मुझे शिकायत करनी चाहिए थी कि आपने तो डीयू प्रोफेसरों की इज्‍जत ही मिटा दी..पर अंदर की बात हम आप जानते ही हैं कि हमारी इज्‍जत पिछले कुछ सालों से, खासकर एफवाईयूपी/सीबीसीएस के बाद कुछ रही ही नहीं। तो वो कोई वांदा नहीं। एक सवाल सो साथी जातिखोज शिक्षकों में जरूर कुलबुलाएगा कि ये 'चौहान' भला 'सिंह साहब' पर ढेले क्‍यों भांज रहा है, तो पहली बार साफ कर दूँ मुझे अपनी जाति पता ही नहीं है, जब तक पता नहीं चलती तब तक लोग ठाकुर समझें इस पर आपत्ति न करने की नीति अपनाई हुई है :)


Tuesday, April 12, 2016

आहत व्यासपोथी



आहत व्यासपोथी
============
एक तख्ती की तरह जमाया
पहला मजबूत विश्वास
थोडा ठोका, दबाया
फिर विश्वास की जमायी
अगली तह
परत दर परत
विश्वास की तलछट चट्टान
किसी एक आंधी भरी शाम
ये व्‍यास  पोथी
हो गयी भुरभुरे शब्दों की
भंगुर किताब
एक तह के शब्द नश्तर हो
निचली तह में घुस गए
जंग खायी कील से पंक्चर
बियाबान में खड़ी गाडी सा बेबस भरोसा
भरोसे को रोयेदार होना चाहिए
लचीला
उसको किताबों सा तो बिल्कुल न होना था
बंद एक तरफ/खुला दूसरी ओर
शब्दों से बिंधा अनहद। 

Saturday, April 09, 2016

मन अक्सों के खेत हैं

तुम्हारे आइने से चुराया मुस्कराकर मैंने तुम्हारा थोड़ा सा अक्स सहेजकर बो दिया उसे मन में, मन ही मन में तुम तुम रहीं तुम्हारे पास मेरे पास फूटता पलता तुम्हारा एक अक्स रहा.. फिर एक दिन सारे दर्पणों को किरिचें उड़ा तुम चल पड़ीं अनजान देशों में शिखरों की यात्रा पर देश जिसमें होते नहीं दर्पण लेकिन भीतर वह छतनार हो चुकी तुम हो वैसी, तुम जैसी नहीं यूँ भी मैं तुम्हारे अक्स के ही सहारे था मन अक्सों के ही खेत हैं।

Wednesday, March 30, 2016

संविधान

एक, दो ,तीन...चार सौ अड़तालीस
मेरे भीतर एक क्‍लाउन गिनकर लेता है
हर चुटकुले पर अट्टहास
साश्रु कभी-कभी,
संविधान साला चुटकले की किताब हो गया है।

Tuesday, March 29, 2016

कैद

मैंने
आइनों को तोड़ा सबसे पहले
चकनाचूर, किरिच किरिच उड़ा दीं
फिर इत्‍मीनान से गढ़ा खुद को
मैं जानती थी हमेशा से
कहा भी मुझे सपनों के उस सौदागर ने
जो बट्टे की मुद्रा में सौदे करता है
मैं जिसे मैंने गढ़ा है
वही मैं हूँ
वही हूँ मैं
मैं हूँ वही
आइनों में कैद न होंउंगी कभी
मैं अपनी गढ़न की कैद में हूँ प्रसन्‍न

Friday, March 18, 2016

आपकी कलैंडरी भारतमाता आपकी है, आप रखिए।

हम भी आपके वाले ही समाज में पैदा हुए इसलिए हमारे मन में भी छवियॉं राजा रविवर्माई कलैंडरों को देख देख मिथकीकृत हुई हैं उसी के आधार पर कहता हूँ कि तनिक ऑंख बंद कर भारतमाता बुदबुदाईए और देखिए आपके मन में कैसी छवि बनती है बहुत संभावना है कि कोई निर्गुण निराकार नहीं वरन नीचे जो संघी भारतमाता है उस किस्म की छवि बनेगी थोड़ा हेरफेर पर वही साड़ी पहनी आभूषणों से भरी शायद शेर, कोई हथियार और हो सकता भगवा (या तिरंगा भी, कोई बात नहीं) झंडा हाथ में लिए। पीछे एक नक्‍शा जिसमें पाकिस्‍तान/बांग्‍लादेश भारत में ही विलीन है।
मैं कलाकार नहीं हूँ इसलिए गूगल से ही तस्‍वीर लेकर रख रहा हूँ किंतु इस राजा रविवर्मा शैली वाली तस्‍वीर के स्‍थान पर कोई हिज़ाब/नकाब वाली, नमाज में झुकी दुआ मॉंगती - भारत माता (या मादरेवतन) की छवि आती तब भी आप इतना ही सहज होते ?
मैं दोनों से ही असहज हूँ क्‍योंकि मेरे लिए भारत इतना सगुणरूप नहीं है लेकिन उसे जाने दें सच यह है कि सिंहवाहिनी भारतमाता की कल्‍पना आप कितना भी शब्दिक मुलम्‍मे चढ़ाएं लेकिन वह है बहुसंख्‍यकवाद ही। औवेसी हो या कोई अन्‍य जब आप उसके प्‍यार (देश से या किसी से भी) करने के तरीके को तय करने की कोशिश करते हैं आप दरअसल बहुसंख्‍यक तानाशाही की आहट लिए होते हैं।